AI और ऑटोमेशन : MSMEs के लिए नया आयाम

Sep 18, 2026 - 13:57
Sep 18, 2026 - 14:01
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AI और ऑटोमेशन : MSMEs के लिए नया आयाम
AI और ऑटोमेशन : MSMEs के लिए नया आयाम

नई दिल्ली, दिल्ली, भारत

भारत की मैन्युफैक्चरिंग MSMEs केवल व्यवसाय तक सीमित नहीं हैं; बल्कि ये रोजगार, नवाचार, (Innovation) निर्यात और देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने का मुख्य इंजन हैं। ये छोटी इकाइयां, बड़े उद्योगों को जरूरी सामान मुहैया कराती हैं और हमारे घरेलू सप्लाई नेटवर्क का आधार बनती हैं। ग्रामीण और शहरी इलाकों के लाखों परिवारों की आजीविका इन्हीं पर निर्भर है। इसलिए, देश के विकास का लक्ष्य तब तक पूरा नहीं हो सकता, जब तक हमारे MSMEs सफल न हों।
 

आज के समय में MSMEs के सामने चुनौतियों के साथ-साथ बाजार की मांग तेजी से बढ़ रही हैं। कच्चे माल की लागत में बढ़ोत्तरी हुई और मजदूरी की लागत भी बढ़ी है। ग्राहकों की उम्मीदें बदल रही हैं और नतीजा वैश्विक स्तर पर मुकाबला कड़ा हो गया है। इसके साथ ही बेहतर गुणवत्ता बनाए रखने और कम समय में डिलीवरी देने का दबाव भी ज्यादा है। इन सब कारणों से मैन्युफैक्चरिंग के पुराने तरीकों पर बहुत अधिक बोझ पड़ रहा है।

बाजार की इस होड़ में टिके रहने और मजबूत बने रहने के लिए, MSMEs को अपने कामकाज के तरीकों को आधुनिक बनाना ही होगा। अब सवाल यह पैदा नहीं होता है कि नई डिजिटल तकनीक को अपनाया जाए या नहीं। अब सवाल यह है कि इसे किफायती और सही तरीके से कैसे लागू किया जाए, जिससे की सबका विकास हो और यह आम नागरिक के हितों को ध्यान में रखकर काम करे।
 

ऐसे में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और ऑटोमेशन एक बड़ा बदलाव लाने का शानदार मौका दे रहे हैं। अगर इनका सही ढंग से और जिम्मेदारी के साथ से इस्तेमाल किया जाए तो ये कंपनियों को स्थिर बनाने के साथ-साथ कर्मचारियों की भलाई भी सुनिश्चित कर सकते हैं। इससे न सिर्फ उत्पादन और प्रतिस्पर्धा की क्षमता बढ़ेगी बल्कि भविष्य में बेहतर नौकरियां भी पैदा होंगी।

महज ऑटोमेशन के बजाय सार्थक और रणनीतिक बदलाव की ओर बढ़ना
देश में AI को लेकर होने वाली चर्चा अक्सर केवल इसकी तकनीकी क्षमताओं तक सीमित रहती हैं। लेकिन AI MSMEs के लिए इसका मुख्य फोकस उन फायदों पर होना चाहिए जो असल में जमीन पर काम आएं।
 

कोई भी तकनीक अंततः लोगों की भलाई के लिए ही होती है। इसलिए AI को अपनाने का नजरिया भी ‘आम नागरिक के हितों को ध्यान में रखकर ही होना चाहिए। इसका मतलब यह है कि सुरक्षित कार्यस्थल, ज्यादा उत्पादकता, सुरक्षित रोजगार, मजबूत उद्योग और समाज के लिए बेहतर आर्थिक अवसर प्रदान करना प्राथमिकता में शामिल है। लेकिन इसका मकसद इंसानों की जगह लेना या उनकी नौकरी छीनना नहीं है। यह तो कर्मचारियों को ऐसे आधुनिक टूल्स से लैस करता है जिससे वे अपना काम ज्यादा प्रभावी ढंग से कर सकें और कंपनी में अहम योगदान दे सकें।

AI का सबसे पहला और बड़ा फायदा है कामकाज से जुड़े डेटा से ऐसे नतीजे निकालना, जिन पर तुरंत ठोस कदम उठाए जा सकें। मशीनों के काम करने का तरीका, प्रोडक्शन रिकॉर्ड और सप्लाई चेन से जुड़ी जानकारी का बारीकी से विश्लेषण करके, AI सिस्टम्स पैटर्न को पहचान सकते हैं। इसके आधार पर वे भविष्य में आने वाली रुकावटों का पहले से अनुमान लगा सकते हैं और समय रहते सही फैसले (प्रोएक्टिव डिसीजन) लेने में मदद कर सकते हैं। मतलब यह कि आने वाली समस्याओं का समय से पहले अनुमान लगाकर उन्हें रोका जा सकता है, लेकिन पहले भारी नुकसान होने के बाद ही जानकारियां मिल पाती थीं।
 

दूसरी तरफ, रोबोटिक वेल्डिंग, भारी सामान उठाने वाली ऑटोमैटिक मशीनें, इंसानों के साथ मिलकर काम करने वाले ‘कोलैबोरेटिव रोबोट्स’ और स्मार्ट पैकेजिंग सॉल्यूशंस जैसी ऑटोमेशन तकनीकें तेजी से कारखानों में अपनी जगह बना रही हैं। ये तकनीक उन सभी कामों को संभाल रही हैं जिन्हें बार-बार करना पड़ता है या जिनमें बहुत ज्यादा शारीरिक मेहनत लगती है। इससे कर्मचारियों को क्वालिटी कंट्रोल (क्वालिटी एश्योरेंस) जैसी प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने, मशीनों के रखरखाव की निगरानी और ग्राहकों के साथ जुड़ने जैसे अहम कामों पर ध्यान केंद्रित करने का मौका मिलता है। ये वे क्षेत्र हैं जहां मानवीय सूझबूझ और फैसले लेना आज भी सबसे जरूरी है।

एजेंटिक एआई (Agentic AI) का उदय
तकनीक की दुनिया में Agentic AI System एक बहुत ही अहम बदलाव है। यह सिस्टम केवल डेटा या जानकारी देने वाले पुराने और आम सॉफ्टवेयर से काफी अलग हैं। ये कंपनी के कामकाज (ऑपरेशन्स) पर बारीकी से नजर रख सकते हैं, अलग-अलग विकल्पों को Compare कर सकते हैं और तय किए गए नियमों के दायरे में रहकर खुद-ब-खुद रोजमर्रा के फैसले एग्ज़ीक्यूट कर सकते हैं।
 

उदाहरण के लिए एक ‘प्रोडक्शन प्लानिंग एजेंट’ की बात की जाये तो यह सिस्टम ग्राहकों के ऑर्डर, मशीनों के खाली होने, कर्मचारियों की शिफ्ट, स्टॉक (इन्वेंट्री) और समय पर डिलीवरी देने जैसी चीजों के बीच लगातार बेहतरीन तालमेल बिठा सकता है। प्रोडक्शन में कोई भी रुकावट आने से पहले ही यह उसका अंदाजा कर लेता है और तुरंत (रियल-टाइम में) सुधार के तरीके सुझा देता है।
 

इसी तरह एक ‘प्रोक्योरमेंट एजेंट’ स्टॉक पर नजर रख सकता है। आगे कितने कच्चे माल की जरूरत पड़ेगी इसका अनुमान लगा सकता है और अलग-अलग सप्लायर्स की तुलना कर सकता है। इतना ही नहीं, यह मैनेजर की मंजूरी के लिए खुद ही ‘परचेज ऑर्डर’ भी तैयार कर सकता है। जाहिर है, इन खूबियों की मदद से MSMEs को कई फायदे होते हैं। उनका जरूरी Stock कभी खत्म नहीं होता (स्टॉक-आउट), गोदाम में बेकार सामान इकट्ठा नहीं होता और रोजमर्रा के खर्चों (वर्किंग-कैपिटल एफिशिएंसी) का मैनेजमेंट भी काफी बेहतर हो जाता है।
 

इन तकनीकों की वजह से अब बिजनेस मालिकों और मैनेजरों को रोजमर्रा के तालमेल (रूटीन कोआर्डिनेशन) में कोई परेशानी नहीं होती है। फिर वे अब अपना पूरा ध्यान बिजनेस की तरक्की, नए आइडिया (इनोवेशन) और ग्राहकों के साथ बेहतर रिश्ते बनाने पर लगा सकते हैं।

प्रोडक्टिविटी गेन्स से लेकर नेशनल कॉम्पिटिटिवनेस तक
AI के फायदे केवल कामकाज को आसान और तेज बनाने तक ही सीमित नहीं हैं।
 

मशीनों में खराबी आने से पहले ही उसका अंदाजा लगा लेने की तकनीक (प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस) से डाउनटाइम का भारी नुकसान काफी हद तक कम हो जाता है। इससे मशीनों का पूरा और सही इस्तेमाल (एसेट यूटिलाइजेशन) सुनिश्चित होता है। स्मार्ट तरीके से चेकिंग करने वाले सिस्टम (इंटेलिजेंट इंस्पेक्शन सिस्टम्स) खराब माल बनने की गुंजाइश और कच्चे माल की बर्बादी को कम करते हैं, जिससे प्रोडक्ट की क्वालिटी कहीं ज्यादा बेहतर हो जाती है।

AI की मदद से चलने वाला इन्वेंट्री मैनेजमेंट, कंपनी के रोजमर्रा के फंड्स (वर्किंग कैपिटल) का सही और किफायती इस्तेमाल तय करता है। वहीं दूसरी ओर रोजाना के कागजी और प्रशासनिक कामों के ऑटोमैटिक हो जाने से फाइनेंस और ऑपरेशन्स की टीमें अपना कीमती समय बड़े और रणनीतिक फैसले लेने में लगा पाती हैं। केस स्टडीज भी यह साबित करती हैं कि ‘प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस’ की मदद से कारखानों में काम रुकने या मशीनों के डाउनटाइम में लगभग 30 प्रतिशत तक की कमी आती है।

(स्रोत:timesofindia-indiatimes-com/technology/tech&news/ai&could&unlock&490& billion&for&indian&msmes&says&google&report/articleshow/132257221-cms) |

कुल मिलाकर देखें तो इन सुधारों से भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में कड़े मुकाबले के लिए मजबूती मिलती है। साथ ही यह देश के अंदर किसी भी झटके को सह सकने वाली एक मजबूत सप्लाई चेन बनाने के बड़े लक्ष्य को भी पूरा करता है।

देश के नजरिए से, मजबूत MSMEs का सीधा अर्थ हैः ज्यादा निर्यात (एक्सपोर्ट), कारखानों में बेहतर उत्पादन, रोजगार के नए मौके और लगातार होने वाला आर्थिक विकास ।

भारी भरकम निवेश के बिना आधुनिकीकरण : वक्त की जरूरत
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन के बारे में सबसे ज्यादा और पुराना भ्रम यह है कि इन्हें अपनाने के लिए बहुत भारी निवेश की जरूरत होती है। लेकिन आज सच कुछ और है। क्लाउड कंप्यूटिंग, ‘सॉफ्टवेयर-एज-ए-सर्विस’ (SaaS) मॉडल और इंडस्ट्रियल AI प्लेटफॉर्मेंस में हो रही नई तरक्की ने इसकी लागत को काफी कम कर दिया है। इससे ये आधुनिक तकनीकें अब MSMEs की पहुंच में बहुत आसानी से आ गई है।

AI का दायरा अब काफी व्यापक और परिपक्व हो चुका है। अब कारखानों और उद्योगों की खास जरूरतों (इंडस्ट्रियल एप्लिकेशन्स) को ध्यान में रखकर कई बेहतरीन सॉल्यूशंस तैयार किए जा रहे हैं, जैसे:-

  • Siemens Industrial Copilot: यह AI की मदद से चलने वाला एक ‘इंडस्ट्रियल असिस्टेंट’ है। इसे इंजीनियरिंग, मशीनों के रखरखाव (मेंटेनेंस) और कारखाने के कामकाज (मैन्युफैक्चरिंग ऑपरेशन्स) में आसानी पैदा करने के लिए बनाया गया है। यह काम की रफ्तार (वर्कफ्लो) को बेहतर बनाता है, किसी भी तकनीकी खराबी को तेजी से ठीक करता है और पूरे इंडस्ट्रियल नेटवर्क में डेटा के आधार पर सही फैसले लेने में मदद भी करता है। [siemens.com], [press.siemens.com]
  • PTC ThingWorx: यह एक प्रमुख इंडस्ट्रियल IoT और डिजिटल प्लेटफॉर्म है। यह मशीनों की तुरंत (रियल-टाइम) निगरानी करने, खराबी आने से पहले ही उसका पता लगाने (प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस) और कामकाज को स्मार्ट बनाने की सुविधा प्रदान करता है। इससे मैन्युफैक्चरर्स को अपना उत्पादन बढ़ाने और मशीनों का पूरा इस्तेमाल (एसेट यूटिलाइजेशन) करने में मदद मिलती है। [worldmetrics.org], [aibucket.io]
  • GE Digital Asset Performance Management (APM): यह उद्योगों में बड़े पैमाने पर अपनाया जाने वाला एक प्रभावी प्लेटफॉर्म है। इसका मुख्य काम खराबी का पहले से अनुमान लगाना, मशीनों की विश्वसनीयता तय करना और जोखिम कम करना (रिस्क मैनेजमेंट) है। इसकी मदद से कारखानों में काम रुकने की समस्या (डाउनटाइम) कम होती है और मशीनों की Life Cycle बढ़ती है। [aibucket.io]
  • Sight Machine: यह कारखाने के FLOOR (शॉप-फ्लोर) से मिलने वाली आम जानकारी को ऐसे डेटा में बदल देता है, जिस पर तुरंत ठोस कदम उठाए जा सकें (एक्शनेबल इनसाइट्स)। इससे कंपनियों को अपने प्रोडक्ट की क्वालिटी सुधारने, काम की गति बढ़ाने (थूपुट) और उत्पादन को बेहतरीन बनाने में मदद मिलती है। [aibucket.io]
  • Augury: यह मशीनों की सेहत और उनकी मजबूती जांचने वाला प्लेटफॉर्म है। यह AI की मदद से मशीनों की आवाज (वाइब्रेशन) और उनके चलने के तरीके का विश्लेषण (Analysis) करता है, ताकि कोई खराबी आने से पहले ही उसका पता लगाया जा सके। इससे छोटे-बड़े सभी तरह के मैन्युफैक्चरर्स के लिए ‘प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस’ आसान हो जाता है। [worldmetrics.org]
  • Detect Technologies और Robro Systems: ये भारत की नई सोच वाली टेक कंपनियां (इनोवेटिव) हैं, जो खास तौर पर कारखानों के माहौल को ध्यान में रखकर अपना प्रोडक्ट बनाती हैं। ये इंडस्ट्रियल चेकिंग (इंस्पेक्शन), सुरक्षा की निगरानी और AI की मदद से चलने वाले क्वालिटी कंट्रोल का बेहतरीन समाधान देती हैं。


इसलिए अब चर्चा इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि यह तकनीक कितनी महंगी है । इसके बजाय, पूरा ध्यान एक ऐसा बेहतरीन माहौल (इकोसिस्टम) बनाने पर होना चाहिए, जिससे कि MSMEs इसे तेजी से अपना सकें। Experience से यह बात सामने आती है कि शुरुआत में ही एक साथ बहुत बड़े बदलाव करने के बजाय, MSMEs को स्टेप बाय स्टेप और नतीजों पर आधारित (रिजल्ट-ओरिएंटेड) तरीके से तकनीक अपनाने में सबसे ज्यादा फायदा होता है।


इसे अपनाने का सबसे सही और व्यावहारिक तरीका यह है कि शुरुआत उन कामों से की जाए जिनका असर तुरंत और सबसे ज्यादा (हाई-इम्पैक्ट) दिखाई दे। उदाहरण के लिए जरूरी मशीनों की समय से पहले चेकिंग (प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस), क्वालिटी चेक करने के लिए AI आधारित विजुअल इंस्पेक्शन (कैमरे से जांच), और स्मार्ट प्रोडक्शन प्लानिंग सिस्टम्स का इस्तेमाल करना। ये सिस्टम्स कंपनी के संसाधनों, स्टॉक (इन्वेंट्री) और डिलीवरी के समय को बेहतरीन तरीके से मैनेज करते हैं। एक बार जब इन शुरुआती कदमों के ठोस और सही नतीजे (मापने योग्य लाभ) मिलने लगें, तो कंपनियां धीरे-धीरे अपने बाकी कामों और कारखानों में भी इस तकनीक का विस्तार कर सकती हैं।


इस बड़े बदलाव को मुमकिन बनाने के लिए सरकार और पॉलिसी मेकर्स को कई स्तरों पर काम करने पर विचार करना चाहिए।
 

  • ‘सब्सक्रिप्शन’ पर आधारित तकनीक खरीदने के मॉडल को बढ़ावा देना, ताकि कंपनियों को शुरुआत में ही बहुत बड़ी रकम (कैपिटल एक्सपेंडिचर) खर्च नहीं करनी पड़े।
  • ‘इंडस्ट्री 4.0’ (Industry 4.0) की आधुनिक तकनीकों को अपनाने वाले MSMEs के लिए विशेष ग्रांट और पायलट प्रोजेक्ट्स को बढ़ाना, या उन्हें 2047 तक टैक्स में पूरी छूट (टैक्स-फ्री हॉलिडे) देना।
  • विश्वविद्यालयों और औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (ITIs) में क्षेत्रीय स्तर पर AI और मैन्युफैक्चरिंग इनोवेशन सेंटर’ की शुरूआत करना और इस तरह के सेंटर पर कारखाने के मालिकों को यह दिखाया जा सके कि तकनीक जमीन पर कैसे काम करती है जिससे कि उन्हें सही तकनीकी मार्गदर्शन मिल सके।
  • ऐसे तकनीकी मानकों (इंटरऑपरेबिलिटी स्टैंडर्ड्स) को तय करना, जिससे कोई भी कंपनी किसी एक ही वेंडर पर निर्भर न रहे और नई तकनीक पुरानी मशीनों के साथ आसानी से जुड़ सके (वेंडर लॉक-इन से बचाव)।
  • डिजिटल तौर पर सक्षम कारखानों में बड़ी और अहम भूमिकाओं (हाई-वैल्यू रोल्स) के लिए कर्मचारियों को तैयार करना। इसके लिए उनकी स्किल्स को निखारने (वर्कफोर्स रीस्किलिंग) की Initiatives को ज्यादा से ज्यादा समर्थन देना।
  • युवाओं को तकनीकी शिक्षा और आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में एक शानदार और आकर्षक करियर बनाने के लिए प्रेरित करना।


इस तरह के कदम उठाने से कंपनियों के लिए वित्तीय और रोजमर्रा के ऑपरेशन्स से जुड़े जोखिम में काफी कमी हो सकती है। साथ ही भारत के पूरे मैन्युफैक्चरिंग नेटवर्क में नई और उन्नत तकनीकों के फैलाव में भी तेजी आएगी।


सबसे जरूरी बात यह है कि उद्योगों में AI के सिलसिले में भारत की सोच ‘आम नागरिक के हितों को ध्यान में रखकर’ होनी चाहिए। इसका मकसद महज दिखावे या अंधाधुंध ऑटोमेशन करना नहीं होना चाहिए। इसके बजाय सही लक्ष्य यह होना चाहिए कि कंपनियां ज्यादा उत्पादन करें, कारखानों में काम करने का माहौल सुरक्षित हो, लोगों के लिए बेहतर क्वालिटी की नौकरियां पैदा हों और हम दुनिया भर में कड़ी टक्कर दे सकने वाली मैन्युफैक्चरिंग ताकत बन सकें।

अगर सही सरकारी नीतियां लागू हों और संस्थानों का पूरा साथ मिले, तो AI ‘सबका विकास’ (समावेशी औद्योगिक विकास) करने के लिए एक बेहद ताकतवर टूल बन सकता है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि नई तकनीक के आने से न सिर्फ आर्थिक मोर्चे पर हमारी ताकत बढ़ेगी, बल्कि समाज का भी तेजी से विकास होगा।


मानवीय पहलू को संभालना
नई तकनीक को अपनाना तभी सफल होता है, जब लोग भी इस बदलाव के सफर का हिस्सा बनें। मशीनों के आने से नौकरियां जाने का जो डर होता है, इस Issue पर खुलकर Discussion होना और कर्मचारियों के विकास में लगातार निवेश करके इस Issue को दूर किया जाना चाहिए। अलग-अलग उद्योगों का अनुभव यह बताता है कि जब भी ऑटोमेशन सफल होता है, तो वह काम को खत्म नहीं करता, बल्कि काम करने का तरीका बदल देता है। इसके बाद मशीनों की देखरेख (मशीन सुपरविजन), क्वालिटी मैनेजमेंट, डिजिटल ऑपरेशन्स, ग्राहकों से जुड़ने और डेटा के आधार पर फैसले लेने जैसी कई नई भूमिकाएं सामने आती हैं।

इसलिए कर्मचारियों को नई तकनीक सिखाना और उनके हुनर को निखारना (अपस्किलिंग और रीस्किलिंग) हर AI प्रोग्राम का सबसे अहम हिस्सा होना चाहिए। हर स्तर के कर्मचारियों को आज की डिजिटल इकॉनमी का हिस्सा बनने के लिए सशक्त बनाना चाहिए ताकि कोई भी इस दौड़ में पीछे नहीं छूटे।

यहीं पर ‘आम नागरिक के हितों को ध्यान में रखकर’ काम करने का नजरिया सबसे ज्यादा जरूरी हो जाता है। आधुनिकीकरण ऐसा होना चाहिए जो कंपनियों को मजबूत करने के साथ-साथ आम लोगों के लिए भी नए अवसर पैदा करे। आर्थिक तरक्की और रोजगार के अवसर, दोनों का विकास एक साथ होना चाहिए।

पॉलिसी मेकर्स और सार्वजनिक संस्थानों की भूमिका

AI को जिम्मेदारी से अपनाने की रफ्तार बढ़ाने के लिए सबको मिलकर कदम उठाने की जरूरत है। इसके साथ ही मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर से जुड़े हर स्तर के कर्मचारियों के कौशल को निखारना भी उतना ही जरूरी है। ऐसा करने पर ही छोटे कारखाने और उद्यम नई उभरती तकनीकों को पूरे आत्मविश्वास के साथ अपना सकेंगे।
 

नीति निर्माताओं, केंद्र और राज्य सरकार की कंपनियों (पब्लिक सेक्टर), बैंकों व वित्तीय संस्थानों, तकनीक देने वाली कंपनियों (टेक्नोलॉजी प्रोवाइडर्स) और शिक्षा जगत (एकेडेमिया) को एक साथ आना होगा। इन सभी को मिलकर जमीनी फीडबैक पर आधारित एक बेहतरीन इकोसिस्टम विकसित करना चाहिए।
 

इसमें सरकारी नीतियां एक बड़ी और अहम भूमिका निभा सकती हैं। उदाहरण के लिए, कंपनियों के CSR फंड की मदद से शुरुआती (पायलट) प्रोजेक्ट्स को समर्थन देना, तकनीक को करीब से समझने के लिए ‘डेमो सेंटर’ (प्रौद्योगिकी प्रदर्शन केंद्र) को स्थापित करना और पूरी इंडस्ट्री के लिए एक जैसे मानक बनाना। इन कदमों से नई तकनीक को पुरानी मशीनों के साथ जोड़ना (इंटरऑपरेबिलिटी) बहुत ही आसान होगा और इसे लागू करने का खर्च भी काफी कम हो जाएगा।

भविष्य के लिए एक नजरिया
भारत आज एक नए औद्योगिक युग की दहलीज पर खड़ा है। AI और ऑटोमेशन अब केवल बड़ी कॉर्पोरेशन्स की जागीर नहीं रह गए हैं। ये तेजी से ऐसे व्यावहारिक टूल्स बन रहे हैं, जिनकी मदद से MSMEs भी विश्व स्तर पर कड़ा मुकाबला करने में सक्षम हो सकते हैं।


आगे का रास्ता पुरानी व्यवस्थाओं को अचानक उखाड़ फेंकने का नहीं है। इसके बजाय यह इंडस्ट्री से मिलने वाले जमीनी फीडबैक पर आधारित एक जिम्मेदार बदलाव का रास्ता दिखाती है। नई तकनीक को कर्मचारियों के विकास, step by step Investment और ‘आम नागरिक के हितों को ध्यान में रखकर’ सामने आने वाले नतीजों के साथ जोड़ना होगा। ऐसा करके MSMEs न सिर्फ एक मजबूत व्यवसाय का निर्माण कर सकते हैं, बल्कि ज्यादा उत्पादन के साथ-साथ लोगों के लिए फायदेमंद रोजगार के अवसर भी पैदा कर सकते हैं।

भारतीय मैन्युफैक्चरिंग का भविष्य वे लोग तय नहीं करेंगे, जो अपने कारखानों में सबसे तेजी से ऑटोमेशन लाते हैं। इसका भविष्य वे लोग तय करेंगे, जो एक Clear Target, सबको साथ लेकर चलने की Inclusivity और सही नजरिए के साथ आधुनिकीकरण करते हैं।

अगर हम इस मौके को समझदारी से अपनाते हैं, तो हमारे MSMEs ग्लोबल स्तर पर कहीं ज्यादा प्रतिस्पर्धी बन सकते हैं। वे घरेलू बाजार के किसी भी उतार-चढ़ाव को झेलने के लिए मजबूत बनेंगे और उन लाखों नागरिकों के लिए ज्यादा अहम साबित होंगे, जिनके सपने इन्हीं की कामयाबी पर टिके हैं।


आलेख: मनोज लाल
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