यदि भारत ने विश्व पर इंग्लैंड की तरह साम्राज्य स्थापित किया होता! (भाग 5) ठाकुर दलीप सिंघ जी

जिन पाठकों को मेरी निम्नलिखित बातें बुरी लगें, उन को यह तथ्य स्वीकार करना चाहिए कि हम मानवों ने पूरी पृथ्वी के जीवों पर अत्याचार कर के, उन पर अपना साम्राज्य स्थापित किया हुआ है। “अवर जोनि तेरी पनिहारी॥ इसु धरती महि तेरी सिकदारी” (सतिगुरू अर्जन देव जी)। किसी ने परोपकार कर के, भक्ति कर के, या शुभ कर्म कर के; पृथ्वी के सभी जीवों पर अपना साम्राज्य स्थापित नहीं किया। यह एक कटु सत्य है। कोई भी साम्राज्य हिंसा, छल, कपट, शोषण आदि से ही स्थापित होता है। केवल अहिंसा, नैतिकता आदि से कोई भी साम्राज्य स्थापित नहीं होता। जिस का भी साम्राज्य हिंसा, छल, कपट, शोषण आदि से स्थापित हो गया; उस का साम्राज्य भी कम से कम 50% बुरे कर्मों से ही स्थापित रहता है। अहिंसा, नैतिकता जैसे शुभ कार्यों से लंबे समय के लिए साम्राज्य स्थापित रह ही नहीं सकता।   मुसलमान तथा ईसाई आक्रांताओं के भारत पर शासन होने कारण, भारत की राज-भाषा “हिंदी” की स्थिति इतनी दयनीय है कि हिंदी का एक भी वाक्य, उन दोनों आक्रांताओं की भाषाएँ, "उर्दू तथा इंग्लिश" के शब्दों के बिना सम्पूर्ण, सुंदर नहीं बनता। भारत के सभी विद्वान: अपनी प्रति दिन की बातचीत में एवं अपने व्याख्यानों/लेखों में, इन आक्रांतआओं की भाषाओं के शब्दों का प्रयोग ऐसे कर जाते हैं, जैसे वह अपनी भाषा के ही शब्दों का प्रयोग कर रहे हों। उन विद्वानों को पता भी नहीं चलता कि वह आक्रांताओं की विदेशी भाषा के शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। इस से ही आप अनुमान लगा सकते हैं कि हमारी भारतीय भाषाओं की स्थिति कितनी दयनीय है।   मुसलमान तथा ईसाई आक्रांताओं के भारत पर शासन होने कारण, भारतीय फिल्मों का कोई भी गीत: आक्रांताओं की इन दोनों भाषाओं (उर्दू तथा अंग्रेज़ी) के शब्दों के बिना नहीं लिखा जाता। हम जनता, इतने भोले हैं कि हमें पता ही नहीं चलता कि यह मनमोहक, रोचक, सुंदर गीतों में विदेशी भाषाओं के शब्द भी हैं। जब फिल्में बननी आरंभ हुई थी; उस समय उर्दू का अधिक प्रभाव था, उर्दू के शब्द अधिक प्रयोग होते थे। अब धीरे-धीरे इंग्लिश का प्रभाव बढ़ने के कारण, हमारे फिल्मी गीतों में अंग्रेज़ी के शब्दों का अधिक प्रयोग होने लगा है। यह केवल फिल्मी गीतों तक ही सीमित नहीं है, यहाँ तक कि अधिकतर भारतीय कविताओं में भी प्रत्येक कवि को इन दोनों भाषाओं के शब्द सम्मिलित करने ही पड़ते हैं। इन विदेशी शब्दों का हिंदी वाक्यों में, हिन्दी गीतों में तथा कविताओं में उपयोग; आम तौर पर अचेत मन से ही विद्वानों द्वारा किया जाता है।   वास्तविकता यह है कि शक्तिशाली, धनवान की नकल: शक्तिहीन, धनहीन व्यक्ति अचेत मन में ही करता है। वही कार्य हम शक्तिहीन, धनहीन भारतीय लोग कर रहे हैं; कभी हम आई.एम.एफ. (IMF) से कर्ज लेते हैं, कभी यूरोप से कुछ मांगते हैं..। यदि भारत ने विश्व पर चक्रवर्ती साम्राज्य स्थापित किया होता तो ऐसा न होता; विदेशी आक्रांताओं की भाषाओं के शब्द अपने गीतों में व कविताओं में, हम भारतीयों को प्रयोग न करने पड़ते। इस के विपरीत: यदि भारत ने विश्व पर इंग्लैंड की तरह साम्राज्य स्थापित किया होता तो, भारत का विश्व पर साम्राज्य स्थापित होने कारण; इंग्लैंड, यूरोप, अमरीका वाले: भारतीय भाषाओं के शब्दों का उपयोग अपने वाक्यों, कविताओं, गीतों में करते। भारतीय शब्दों का उपयोग कर के, वह लोग वैसे ही गर्व महसूस करते; जैसे अंग्रेज़ी, उर्दू के शब्दों का उपयोग कर के, हम भारतीय गर्व महसूस कर रहे हैं।   यदि भारत ने विश्व पर इंग्लैंड की तरह साम्राज्य स्थापित किया होता तो, विश्व की सभी भाषाओं में भी भारतीय भाषाओं के शब्दों का प्रयोग करना अचेत में ही अनिवार्य हो जाना था: जैसे भारत में इंग्लिश तथा उर्दू के शब्दों का उपयोग करना अनिवार्य हो गया है। भारतीय भाषाओं में से केवल हिन्दी या संस्कृत का प्रयोग ही आवश्यक नहीं होना था; उस में उड़िया, कन्नड़, तेलगू, असामी, गुजराती, पंजाबी किसी भी भारतीय भाषा के शब्दों का प्रयोग हो सकता था। यहाँ तक कि, भारत पर शासन करने वाले इन आक्रांताओं की भाषाओं में भी: भारतीय भाषा के शब्दों का प्रयोग अचेत में ही अनिवार्य होना था।   आधुनिक युग में पूरे विश्व में ईमेल का बहुत उपयोग हो रहा है। भले ही ईमेल हम किसी भी भाषा में लिख सकते हैं परंतु, ईमेल में जो id/पता लिखना होता है, वह केवल अंग्रेज़ी लिपी में ही लिखना पड़ता है। चीन, जापान, भारत, अरब देश; जिन की अपनी भाषाएं इंग्लिश से कहीं अधिक प्राचीन हैं एवं अत्यंत समृद्ध हैं: उन को भी ईमेल का id/पता अंग्रेज़ी में ही लिखना पड़ता है। क्योंकि, इंग्लैंड ने विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित कर के, "इंग्लिश" को विश्व में स्थापित किया था। यदि भारत ने इंग्लैंड की तरह विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित किया होता तो, विश्व भर में सभी को ईमेल का पता: "भारतीय भाषा" की लिपियों में ही लिखना पड़ता; अंग्रेज़ी में न लिखना पड़ता।   आज कल, सभी बड़ी-बड़ी पदवियों के लिए उपाधि के जो नाम विश्व भर में प्रयोग हो रहे हैं, जैसे: जैनरल, कमांडर, प्राइम मिनिस्टर, प्रेसिडेंट, चीफ मिनिस्टर, एम.एल.ए. आदि। यह सभी पदवियों के नाम अंग्रेज़ी में लिखे जाते हैं एवं उच्चारण किए जाते हैं। यही नाम पूरे विश्व में प्रसिद्ध हो चुके हैं। क्योंकि, इंग्लैंड ने विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित किया था। यदि भारत ने इंग्लैंड की तरह विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित किया होता तो, ऐसे सभी नाम भारतीय भाषा में प्रचलित होने थे। जैसे: सेनापति, सेना अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति आदि। परंतु, ऐसा नहीं है।   आत्मसम्मान ना होने कारण, हमारे देश में लोगों की मानसिक स्थिति इतनी दयनीय है कि हमारी सब से बड़ी राष्ट्रवादी संस्था (RSS) "राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ" (जिस की विश्व के 140 देशों में शाखाएं है); उस के अधिकारी भी अपने नाम के साथ एक उपाधि रूप में भी, विदेशी भाषा का शब्द "डॉक्टर" लगाते हैं। पता उन को भी है कि "डॉक्टर" शब्द तो विदे

Thu, 12 Feb 2026 05:13 PM (IST)
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यदि भारत ने विश्व पर इंग्लैंड की तरह साम्राज्य स्थापित किया होता! (भाग 5) ठाकुर दलीप सिंघ जी
यदि भारत ने विश्व पर इंग्लैंड की तरह साम्राज्य स्थापित किया होता! (भाग 5) ठाकुर दलीप सिंघ जी

जिन पाठकों को मेरी निम्नलिखित बातें बुरी लगें, उन को यह तथ्य स्वीकार करना चाहिए कि हम मानवों ने पूरी पृथ्वी के जीवों पर अत्याचार कर के, उन पर अपना साम्राज्य स्थापित किया हुआ है। अवर जोनि तेरी पनिहारी॥ इसु धरती महि तेरी सिकदारी” (सतिगुरू अर्जन देव जी) किसी ने परोपकार कर के, भक्ति कर के, या शुभ कर्म कर के; पृथ्वी के सभी जीवों पर अपना साम्राज्य स्थापित नहीं किया। यह एक कटु सत्य है। कोई भी साम्राज्य हिंसा, छल, कपट, शोषण आदि से ही स्थापित होता है। केवल अहिंसा, नैतिकता आदि से कोई भी साम्राज्य स्थापित नहीं होता। जिस का भी साम्राज्य हिंसा, छल, कपट, शोषण आदि से स्थापित हो गया; उस का साम्राज्य भी कम से कम 50% बुरे कर्मों से ही स्थापित रहता है। अहिंसा, नैतिकता जैसे शुभ कार्यों से लंबे समय के लिए साम्राज्य स्थापित रह ही नहीं सकता।

 

मुसलमान तथा ईसाई आक्रांताओं के भारत पर शासन होने कारण, भारत की राज-भाषाहिंदीकी स्थिति इतनी दयनीय है कि हिंदी का एक भी वाक्य, उन दोनों आक्रांताओं की भाषाएँ, "उर्दू तथा इंग्लिश" के शब्दों के बिना सम्पूर्ण, सुंदर नहीं बनता। भारत के सभी विद्वान: अपनी प्रति दिन की बातचीत में एवं अपने व्याख्यानों/लेखों में, इन आक्रांतआओं की भाषाओं के शब्दों का प्रयोग ऐसे कर जाते हैं, जैसे वह अपनी भाषा के ही शब्दों का प्रयोग कर रहे हों। उन विद्वानों को पता भी नहीं चलता कि वह आक्रांताओं की विदेशी भाषा के शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। इस से ही आप अनुमान लगा सकते हैं कि हमारी भारतीय भाषाओं की स्थिति कितनी दयनीय है।

 

मुसलमान तथा ईसाई आक्रांताओं के भारत पर शासन होने कारण, भारतीय फिल्मों का कोई भी गीत: आक्रांताओं की इन दोनों भाषाओं (उर्दू तथा अंग्रेज़ी) के शब्दों के बिना नहीं लिखा जाता। हम जनता, इतने भोले हैं कि हमें पता ही नहीं चलता कि यह मनमोहक, रोचक, सुंदर गीतों में विदेशी भाषाओं के शब्द भी हैं। जब फिल्में बननी आरंभ हुई थी; उस समय उर्दू का अधिक प्रभाव था, उर्दू के शब्द अधिक प्रयोग होते थे। अब धीरे-धीरे इंग्लिश का प्रभाव बढ़ने के कारण, हमारे फिल्मी गीतों में अंग्रेज़ी के शब्दों का अधिक प्रयोग होने लगा है। यह केवल फिल्मी गीतों तक ही सीमित नहीं है, यहाँ तक कि अधिकतर भारतीय कविताओं में भी प्रत्येक कवि को इन दोनों भाषाओं के शब्द सम्मिलित करने ही पड़ते हैं। इन विदेशी शब्दों का हिंदी वाक्यों में, हिन्दी गीतों में तथा कविताओं में उपयोग; आम तौर पर अचेत मन से ही विद्वानों द्वारा किया जाता है।

 

वास्तविकता यह है कि शक्तिशाली, धनवान की नकल: शक्तिहीन, धनहीन व्यक्ति अचेत मन में ही करता है। वही कार्य हम शक्तिहीन, धनहीन भारतीय लोग कर रहे हैं; कभी हम आई.एम.एफ. (IMF) से कर्ज लेते हैं, कभी यूरोप से कुछ मांगते हैं.. यदि भारत ने विश्व पर चक्रवर्ती साम्राज्य स्थापित किया होता तो ऐसा होता; विदेशी आक्रांताओं की भाषाओं के शब्द अपने गीतों में कविताओं में, हम भारतीयों को प्रयोग करने पड़ते। इस के विपरीत: यदि भारत ने विश्व पर इंग्लैंड की तरह साम्राज्य स्थापित किया होता तो, भारत का विश्व पर साम्राज्य स्थापित होने कारण; इंग्लैंड, यूरोप, अमरीका वाले: भारतीय भाषाओं के शब्दों का उपयोग अपने वाक्यों, कविताओं, गीतों में करते। भारतीय शब्दों का उपयोग कर के, वह लोग वैसे ही गर्व महसूस करते; जैसे अंग्रेज़ी, उर्दू के शब्दों का उपयोग कर के, हम भारतीय गर्व महसूस कर रहे हैं।

 

यदि भारत ने विश्व पर इंग्लैंड की तरह साम्राज्य स्थापित किया होता तो, विश्व की सभी भाषाओं में भी भारतीय भाषाओं के शब्दों का प्रयोग करना अचेत में ही अनिवार्य हो जाना था: जैसे भारत में इंग्लिश तथा उर्दू के शब्दों का उपयोग करना अनिवार्य हो गया है। भारतीय भाषाओं में से केवल हिन्दी या संस्कृत का प्रयोग ही आवश्यक नहीं होना था; उस में उड़िया, कन्नड़, तेलगू, असामी, गुजराती, पंजाबी किसी भी भारतीय भाषा के शब्दों का प्रयोग हो सकता था। यहाँ तक कि, भारत पर शासन करने वाले इन आक्रांताओं की भाषाओं में भी: भारतीय भाषा के शब्दों का प्रयोग अचेत में ही अनिवार्य होना था।

 

आधुनिक युग में पूरे विश्व में ईमेल का बहुत उपयोग हो रहा है। भले ही ईमेल हम किसी भी भाषा में लिख सकते हैं परंतु, ईमेल में जो id/पता लिखना होता है, वह केवल अंग्रेज़ी लिपी में ही लिखना पड़ता है। चीन, जापान, भारत, अरब देश; जिन की अपनी भाषाएं इंग्लिश से कहीं अधिक प्राचीन हैं एवं अत्यंत समृद्ध हैं: उन को भी ईमेल का id/पता अंग्रेज़ी में ही लिखना पड़ता है। क्योंकि, इंग्लैंड ने विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित कर के, "इंग्लिश" को विश्व में स्थापित किया था। यदि भारत ने इंग्लैंड की तरह विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित किया होता तो, विश्व भर में सभी को ईमेल का पता: "भारतीय भाषा" की लिपियों में ही लिखना पड़ता; अंग्रेज़ी में लिखना पड़ता।

 

आज कल, सभी बड़ी-बड़ी पदवियों के लिए उपाधि के जो नाम विश्व भर में प्रयोग हो रहे हैं, जैसे: जैनरल, कमांडर, प्राइम मिनिस्टर, प्रेसिडेंट, चीफ मिनिस्टर, एम.एल.. आदि। यह सभी पदवियों के नाम अंग्रेज़ी में लिखे जाते हैं एवं उच्चारण किए जाते हैं। यही नाम पूरे विश्व में प्रसिद्ध हो चुके हैं। क्योंकि, इंग्लैंड ने विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित किया था। यदि भारत ने इंग्लैंड की तरह विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित किया होता तो, ऐसे सभी नाम भारतीय भाषा में प्रचलित होने थे। जैसे: सेनापति, सेना अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति आदि। परंतु, ऐसा नहीं है।

 

आत्मसम्मान ना होने कारण, हमारे देश में लोगों की मानसिक स्थिति इतनी दयनीय है कि हमारी सब से बड़ी राष्ट्रवादी संस्था (RSS) "राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ" (जिस की विश्व के 140 देशों में शाखाएं है); उस के अधिकारी भी अपने नाम के साथ एक उपाधि रूप में भी, विदेशी भाषा का शब्द "डॉक्टर" लगाते हैं। पता उन को भी है कि "डॉक्टर" शब्द तो विदेशी भाषा का है, भारतीय भाषा का नहीं है। परंतु, अंग्रेजों के विश्व पर शासन के कारण अंग्रेज़ी का यह शब्द, एक उपाधि रूप में इतना प्रचलित लोकप्रिय हो चुका है कि विदेशी भाषा में लिखी गई इस उपाधि का प्रयोग, भारत के राष्ट्रवादी भी कर रहे हैं जैसे: डॉक्टर हेडगेवार, डॉक्टर कृष्ण गोपाल आदि। इंग्लैंड वाले तो अपने नाम या उपाधि में हमारी तमिल, तेलगू आदि किसी भी भारतीय भाषा के शब्दों का कभी भी प्रयोग नहीं करते क्योंकि हम आज भी गरीब तथा शक्तिहीन हैं। विदेशी भाषा में लिखी इस डॉक्टर की उपाधि को प्रयोग कर के, हम भारतीय लोग अपने में बहुत गर्व महसूस करते हैं। परंतु, इस के विपरीत अपनी भारतीय भाषा में जो विशेष उपाधियाँ हैं, जैसे कुलपति, वाचस्पति, कविपृय, वैद्य विशारद, पंडित, प्रबुद्ध, ज्ञानी, चिकित्सक, वैद्य आदि, उन का उपयोग करते हुए, हम भारतीयों को गर्व नहीं होता: अपितु, शर्म आती है। यदि भारत ने विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित कर के, भारतीय भाषाओं का आधिपत्य बनाया होता तो; पूरे विश्व के लोग भी इसी प्रकार के भारतीय भाषा के शब्द अपनी उपाधि के रूप में प्रयोग कर के गर्व महसूस करते; जैसे वह आज इंग्लिश के शब्दों का प्रयोग कर के गर्व महसूस कर रहे हैं।

 

विश्व पर इंग्लैंड का साम्राज्य स्थापित होने कारण, इंग्लिश की सत्ता तथा आवश्यकता इतनी बढ़ गई है कि रूस जैसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति पुतिन जी ने भी 15 अगस्त 2025 को अलास्का में हुए शांति समागम समय, अंग्रेज़ी बोल कर गर्व महसूस किया। रूस की तो अपनी भाषा भी बहुत समृद्ध है, जिस पर रूस के लोग अत्यंत गर्व भी करते हैं। फिर भी पुतिन जी को इंग्लिश बोलनी पड़ी, क्यों? कारण स्पष्ट है: इंग्लिश का आज पूरे विश्व की जनता के मन पर साम्राज्य है। इस के विपरीत, अमरीका के राष्ट्रपति को रूसी भाषा सीखने की आवश्यकता नहीं। जब अमरीका का कोई भी राष्ट्रपति रूस में जाएगा तो; वहां जा कर वह रूसी भाषा में बोल कर गर्व महसूस नहीं करेगा। क्योंकि, रूस ने इंग्लैंड की तरह विश्व पर साम्राज्य स्थापित कर के, अपनी "रूसी" भाषा को उसी तरह से प्रचलित नहीं कर दिया; जैसे कि इंग्लैंड ने कर दिया है। इस लिए, नैतिक/अनैतिक जैसी निरार्थक, निराधार बातों को छोड़ कर, यदि भारत को विश्व में अपनी सभ्यता एवं अपनी भाषा प्रचलित करनी है तो: विश्व पर इंग्लैंड की तरह साम्राज्य स्थापित करना अत्यंत आवश्यक है। अपनी संस्कृति एवं भाषा को सुरक्षित करने हेतु तथा विश्व में लागू करने हेतु, विश्व पर साम्राज्य स्थापित किए बिना: अपनी संस्कृति, धर्म एवं भाषा को सुरक्षित करने का कोई और विकल्प है ही नहीं।

 

इंग्लैंड का विश्व पर साम्राज्य स्थापित होने कारण तथा भारत पर इंग्लैंड का लंबे समय तक साम्राज्य स्थापित रहने कारण: आज स्थिति यह है कि भारत के प्रधानमंत्री मोदी जी (जो बहुत बड़े देश भक्त हैं तथा आर.एस.एस. के बहुत वर्षों तक प्रचारक भी रह चुके हैं) वह भी अपनी मातृ-भाषा गुजराती एवं भारत की राज-भाषा हिंदी को छोड़ कर: भारत में ही कई स्थानों पर अंग्रेज़ी में भाषण दे रहे हैं। केवल, लोगों में यह दिखाने के लिए कि मुझे भी अंग्रेज़ी आती है। भारत के राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री मोदी जी को अंग्रेज़ी बोल कर; मातृ-भाषा गुजराती या राज-भाषा हिंदी से कहीं अधिक गर्व महसूस होता है। यदि ऐसा नहीं तो: बिहार में तथा अन्य कई स्थानों पर मोदी जी अंग्रेज़ी में भाषण क्यों देते हैं? क्यों अंग्रेज़ी के शब्दों का अपने वक्तव्य में प्रयोग करते हैं? वहाँ तो कोई विदेशी पत्रकार नहीं होते। प्रधानमंत्री मोदी जी, यह कार्य केवल विदेशी पत्रकारों को अपनी बात समझाने के लिए नहीं कर रहे। यदि केवल विदेशी पत्रकारों को अपनी बात समझने- समझाने का ही मुख्य लक्ष्य होता; तो वह कार्य कोई भी ट्रांसलेटर कर सकता था, जैसे यू.एन.. में होता है। वहां पर ट्रांसलेटर सभी भाषाओं की ट्रांसलेशन कर के, सभी को बताते हैं। वहां पर सभी लोग केवल इंग्लिश समझने, बोलने तथा लिखने वाले नहीं होते। वहाँ तो 195 देशों के लोगों की अपनी-अपनी भाषा होती है। जर्मनी, फ्रांस, स्पेन, इटली आदि के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, अध्यक्ष आदि, जब अपनी भाषा में वक्तव्य देते हैं; तो वह वक्तव्य भी अंतर्राष्ट्रीय सत्र पर, ट्रांसलेशन/अनुवाद कर के विदेशी पत्रकारों को समझाए जाते हैं। उन वक्तव्यों पर पूरे विश्व के मीडिया में चर्चा होती है, आलोचना होती है। इसी तरह ही, हमारे प्रधानमंत्री जी द्वारा भारतीय भाषा में दिए गए वक्तव्य को भी अनुवाद कर के समझाया जा सकता था। उन के भारतीय भाषा के वक्तव्य पर भी, विदेशी पत्रकार चर्चा, समर्थन या आलोचना कर सकते थे। परंतु, प्रधानमंत्री जी द्वारा ऐसा नहीं किया गया।

 

इस के विपरीत: इंग्लैंड, अमरीका के राष्ट्रपति या बड़े पदाधिकारी तो; भारत में या कहीं भी किसी भारतीय भाषा में अपना वक्तव्य नहीं देते। क्यों? उन को भारतीय भाषा में वक्तव्य देने की आवश्यकता ही नहीं; क्योंकि भारतीय भाषा विश्व में शासन नहीं कर रही, अपितु "इंग्लिश" विश्व में शासन कर रही है। भारतीय पत्रकारों ने भी उन की भाषा "इंग्लिश" समझ लेनी है। पत्रकारों ने भी नहीं कहना कि हमें वक्तव्य भारतीय भाषा में चाहिए क्योंकि उन में भी तो आत्मसम्मान नहीं है। भारतीय पत्रकार भी इंग्लिश लिख, बोल कर ही गर्व महसूस करते हैं।

 

अमरीका या इंग्लैंड के बड़े मंत्रीगण, राष्ट्रपति या बड़े पदाधिकारी; भारतीय भाषा बोल कर, मोदी जी जैसा गर्व महसूस नहीं करते क्योंकि, कोई भी शक्तिशाली, धनवान; शक्तिहीन, धनहीन गुलाम की भाषा बोल कर क्यों गर्व महसूस करेगा? हम भारतीय तो मानसिक रूप से ठहरे, शक्तिहीन, धनहीन गुलाम! इसी कारण, अमीर, शक्तिशालियों की भाषा बोल कर, हम गर्व महसूस करते हैं। इस सोच को बदलने की आवश्यकता है।

 

भारत को विश्व पर अपना साम्राज्य बना कर; पूरे विश्व पर अपनी संस्कृति भाषा स्थापित करने की आवश्यकता है। भारत की संस्कृति से ही, पूरे विश्व में शांति स्थापित हो सकती है। हमारे सिख पंथ मेंसरबत का भलाहमारी प्रत्येक प्रार्थना में बोला जाता है, जिस का अर्थ है: संपूर्ण विश्व में शांति हो और सभी सुखी रहें। अन्य किसी भी संस्कृति की प्रार्थना में ऐसा महावाक्य प्रतिदिन नहीं पढ़ा जाता।

 

जय भारत

 

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